
रायपुर। रायपुर के तेलीबांधा से लाभांडीह तक की करोड़ों की जमीन का विवाद फिर से सुर्खियों में है। यह जमीन, जिसे कभी किसानों के जीवन-यापन के लिए खेती करने हेतु दिया गया था, आज बड़े-बड़े व्यवसायिक परिसरों, शॉपिंग मॉल, होटल और अपार्टमेंट्स में तब्दील हो चुके है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह जमीन बेची जा सकती थी? क्या यह हस्तांतरण वैध था?
क्या है मलिकमखबूजा भूमि?
ब्रिटिश शासन के दौरान, जब मालगुजारी प्रथा को समाप्त किया गया, तब सरकार ने मलिकमखबूजा नामक भूमि व्यवस्था लागू की। इसके तहत, जो किसान 1 अक्टूबर 1955 के पहले जिस जमीन पर खेती कर रहे थे, उन्हें उस भूमि का “कृषि उपयोग के लिए” मालिकाना हक दिया गया था। लेकिन यह एक विशेष प्रकार का स्वामित्व था – किसान इस भूमि को केवल खेती के लिए रख सकते थे, न कि इसे किसी और को बेच सकते थे या अन्य व्यावसायिक उद्देश्यों में उपयोग कर सकते थे।
भारतीय संत सनातन धर्म रक्षा संघ ने उठाई भ्रष्टाचार के विरुद्ध सशक्त आवाज
भारतीय संत सनातन धर्म रक्षा संघ ने मलिक मकबूजा भूमि घोटाले में संलिप्त भ्रष्ट अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए कहा है कि यह केवल सरकारी जमीन का हड़पने का मामला नहीं, बल्कि किसानों के अधिकारों की खुली लूट है। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि दोषियों पर जल्द से जल्द कानूनी कार्यवाही नहीं हुई, तो व्यापक जन आंदोलन किया जाएगा। संघ ने इस अवैध भूमि सौदेबाजी में लिप्त अधिकारियों की बर्खास्तगी और उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 409, 420, 467, 120बी तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत कठोर कार्रवाई की मांग की है। सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए संघ ने कहा कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो यह लड़ाई न्यायालय से लेकर सड़कों तक लड़ी जाएगी।
गुरु बालकदास जी और मलिकमखबूजा भूमि का संबंध
महान संत गुरु बालकदास जी, जिन्होंने अपने जीवन को समाज सुधार और सत्य के मार्ग पर समर्पित किया, किसानों और वंचित समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे। उनके प्रयासों ने उन लोगों को हिम्मत दी, जो कभी बड़े जमींदारों और प्रभावशाली लोगों के दबाव में अपनी जमीनें खो देते थे। उनका मानना था कि प्रत्येक किसान को उसकी मेहनत के अनुसार अधिकार मिलना चाहिए, और वह अपनी भूमि पर शांति से खेती कर सके।
कैसे हुई मलिकमखबूजा जमीन की अवैध बिक्री?
समय के साथ, इन जमीनों के असली मालिकों (किसानों) ने कुछ साहूकारों और संपन्न व्यापारियों के दबाव या लालच में आकर इन्हें बेच दिया। हालांकि कानूनन ऐसा करना संभव नहीं था, फिर भी बिना सरकार की अनुमति के इन जमीनों की रजिस्ट्री होती रही। उस समय प्रशासनिक लापरवाही के चलते कुछ लोगों ने इन जमीनों को व्यवसायिक उपयोग में लेना शुरू कर दिया और उन पर बड़े-बड़े निर्माण कार्य करा लिए।
आज की स्थिति: 5000 करोड़ की सरकारी जमीन पर निजी व्यापार!
आज तेलीबांधा से लाभांडीह तक फैली यह जमीन, जिसकी कीमत करीब 5000 करोड़ रुपये से अधिक बताई जाती है, उन लोगों के कब्जे में है, जिन्होंने इसे खेती के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग किया। यहां कई जगह शॉपिंग मॉल, होटल और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बन चुके हैं।
वर्तमान समय में जब भूमि रिकॉर्ड को ऑनलाइन अपडेट किया गया, तब इन जमीनों की असलियत सामने आई। यह स्पष्ट हुआ कि इनका नामांतरण (म्यूटेशन) कानूनी रूप से संभव नहीं था, लेकिन पहले के समय में कई अधिकारियों ने इस प्रक्रिया में लापरवाही दिखाई और बिना किसी वैध अनुमति के भूमि स्वामित्व को बदल दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और कानूनी स्थिति
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में स्पष्ट किया है कि मलिकमखबूजा भूमि को सरकार की अनुमति के बिना बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में अवैध बिक्री को रद्द करने के आदेश भी जारी किए गए हैं। लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन आदेशों को लागू करवाना अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।
अब आगे क्या?
* सरकार को चाहिए कि वह इन जमीनों की जांच करे और अवैध रूप से बेची गई भूमि को वापस ले।
* किसानों और असली हकदारों को न्याय मिले, ताकि भविष्य में इस तरह की धोखाधड़ी न हो।
* सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए, भूमि संबंधी कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए।
सारांश:
मलिकमखबूजा जमीन का असल मकसद किसानों को स्थायी भूमि सुरक्षा देना था, लेकिन समय के साथ इसका गलत फायदा उठाया गया। गुरु बालकदास जी जैसे महापुरुषों ने जिन मूल्यों के लिए संघर्ष किया, उन्हें बनाए रखने के लिए प्रशासन को सख्त कदम उठाने होंगे। जब तक कानून का पालन नहीं किया जाता, तब तक आम जनता के अधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे।




