
रायपुर। राजधानी रायपुर में अवैध शराबखोरी और नियमों की खुलेआम अवहेलना का एक गंभीर मामला फिर से प्रकाश में आया है। पंडरी शराब भट्टी के ठीक बगल में स्थित एक दुकान में वर्षों से अवैध आहता संचालित हो रहा है, जिसके बारे में आबकारी विभाग और स्थानीय पुलिस को लंबे समय से जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
आबकारी विभाग के विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, इस अवैध आहता का संचालन हेमंत सिन्हा द्वारा किया जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि हेमंत सिन्हा आबकारी अधिकारी को ₹30,000 प्रतिमाह और देवेन्द्र नगर थाना प्रभारी को ₹20,000 प्रतिमाह कथित रूप से देता है। इसके एवज में अधिकारी अवैध गतिविधियों पर नजरअंदाज कर रहे हैं।
सबसे गंभीर प्रश्न यह उठता है कि यह आहता शराब भट्टी के इतने समीप कैसे संचालित हो रहा है? क्या आबकारी विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी, या जानबूझकर इसे नजरअंदाज किया गया? सूत्रों का कहना है कि आहता संचालक हेमंत सिन्हा को आबकारी अधिकारी आशीष सिंह का भी संरक्षण प्राप्त है। इसके कारण विभागीय अमला मौके पर पहुंचने से पहले ही ‘मैनेजमेंट’ कर लिया जाता है। यही कारण है कि शिकायतों के बावजूद न तो आहता सील हुआ और न ही किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई की गई।
स्थानीय नागरिकों ने कहा कि अवैध आहते के चलते क्षेत्र में अराजकता, झगड़े और असामाजिक गतिविधियों में वृद्धि हुई है। हालांकि जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए हैं, जिससे कानून और प्रशासन के प्रति जनता में असंतोष बढ़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक अवैध आहते तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुलिस–आबकारी गठजोड़ और संरक्षण की गंभीर संभावना को दर्शाता है। यदि आरोप सही हैं, तो यह राज्य शासन की छवि और कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
स्थानीय समाजसेवी और व्यापारी भी इस मामले में नाराज हैं। उनका कहना है कि यदि ऐसे अवैध आहते खुलेआम संचालित होते रहेंगे, तो कानून व्यवस्था की अवहेलना के साथ-साथ सामाजिक अस्थिरता बढ़ेगी। उन्होंने उच्च अधिकारियों और निगरानी एजेंसियों से इस मामले में तुरंत संज्ञान लेने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
राज्य में अवैध शराब पर लगातार कार्रवाई की बात की जाती रही है। लेकिन पंडरी इलाके का यह मामला यह दिखाता है कि कानून लागू करने वाले ही कानून को नजरअंदाज कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रशासन और आबकारी विभाग इस मामले में निष्पक्ष जांच नहीं करते हैं, तो इससे आम जनता में विश्वास की कमी पैदा होगी।
अब सवाल यह है कि वरिष्ठ अधिकारी, शासन और निगरानी एजेंसियाँ इस गंभीर खुलासे पर संज्ञान लेंगी या यह मामला भी फाइलों में दफन रह जाएगा। यह देखना बाकी है कि राज्य प्रशासन जनता के विश्वास को बहाल करने के लिए प्रभावी कदम उठाता है या यह अनदेखी और संरक्षण की परंपरा जारी रहती है। स्थानीय लोग भी यह आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो अन्य लोग भी अवैध गतिविधियों में लिप्त होकर कानून की अवहेलना कर सकते हैं।




