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अभी चीता की राख ठंडी नहीं हुई… पर छत्तीसगढ़ सरकार को सत्ता के समारोह की जल्दी!

रायपुर. जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले ने पूरे देश को गहरे शोक और आक्रोश में डुबो दिया है। 28 निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या और जवानों की शहादत के बाद देशभर में मातम पसरा हुआ है, लेकिन छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार सत्ता के उत्सव में मशगूल है। यह दृश्य केवल असंवेदनशील नहीं, बल्कि जनभावनाओं के अपमान का स्पष्ट प्रतीक बन चुका है।

पहलगाम हमला-राष्ट्रीय आत्मा पर घात

20 अप्रैल को पहलगाम में हुए इस कायराना हमले में देश ने न केवल कई निर्दोष जानें गंवाईं, बल्कि सुरक्षा बलों के वीर जवानों को भी खो दिया। ऐसे समय में जबकि दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई की तैयारी की जा रही है, छत्तीसगढ़ सरकार ने आज 25 अप्रैल को शाम 4:30 बजे मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में शपथग्रहण एवं सम्मान समारोह तय कर दिया।

रायपुर के दिनेश मीरानिया की चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पहलगाम हमले में जान गंवाने वालों में रायपुर निवासी दिनेश मीरानिया भी शामिल थे, जिनका अंतिम संस्कार अभी हाल ही में हुआ है। उनकी चिता की राख तक ठंडी नहीं हुई, और राज्य सरकार सत्ता के जश्न में व्यस्त है।

क्या सत्ता संवेदनशीलता से बड़ी हो गई है?

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, दोनों उपमुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, मंत्रिमंडल के सदस्य, सांसद-विधायक और तमाम गणमान्य अतिथियों के साथ इस समारोह में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं। प्रश्न यही है- क्या एक सप्ताह तक प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी? क्या राष्ट्र की पीड़ा से अधिक जरूरी सत्ता का उत्सव हो गया है?

संघ के अध्यक्ष राहुल तिवारी की कड़ी निंदा

भारतीय संत सनातन धर्म रक्षा संघ के अध्यक्ष श्री राहुल तिवारी ने इस आयोजन को “राष्ट्रीय भावनाओं की उपेक्षा” करार देते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा- “जब देश रो रहा हो, तब सत्ता की सजावट करना नैतिक अपराध है। दिनेश मीरानिया की चिता की राख अभी ठंडी नहीं हुई और रायपुर की सत्ता मुस्कुरा रही है, यह शर्मनाक है। भाजपा सरकार को कम से कम इस आयोजन को स्थगित कर राष्ट्र के साथ खड़े होने का नैतिक साहस दिखाना चाहिए था।”

भाजपा को चाहिए आत्मावलोकन

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार का यह निर्णय बताता है कि संवेदनाएं अब राजनीति में गौण हो चुकी हैं। यह आयोजन स्थगित न करके सरकार ने शहीदों की स्मृति को पीछे और सत्ता की आकांक्षा को आगे रख दिया है—जो कि एक लोकतांत्रिक राज्य के लिए न केवल निंदनीय है, बल्कि घोर दुर्भाग्यपूर्ण भी।

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