रायपुर। आज तेलीबांधा से लाभांडीह तक फैली यह जमीन, जिसकी कीमत करीब 5000 करोड़ रुपये से अधिक बताई जाती है, उन लोगों के कब्जे में है, जिन्होंने इसे खेती के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग किया। यहां कई जगह शॉपिंग मॉल, होटल और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बन चुके हैं। वर्तमान समय में जब भूमि रिकॉर्ड को ऑनलाइन अपडेट किया गया, तब इन जमीनों की असलियत सामने आई। यह स्पष्ट हुआ कि इनका नामांतरण (म्यूटेशन) कानूनी रूप से संभव नहीं था, लेकिन पहले के समय में कई अधिकारियों ने इस प्रक्रिया में लापरवाही दिखाई और बिना किसी वैध अनुमति के भूमि स्वामित्व को बदल दिया।
भारतीय संत सनातन धर्म रक्षा संघ ने छत्तीसगढ़ में 5000 करोड़ रुपये के मलिक मकबूजा भूमि घोटाले का पर्दाफाश करते हुए भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। संघ का आरोप है कि राजस्व विभाग के कुछ अधिकारियों ने आर्थिक लाभ के लिए शासकीय मलिक मकबूजा भूमि को प्रभावशाली व्यक्तियों के नाम पर अवैध रूप से चढ़ा दिया। यह कृत्य किसानों के अधिकारों का सीधा हनन है, जो केवल कृषि उपयोग के लिए दी गई जमीनों को व्यवसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।संघ ने स्पष्ट किया है कि यह घोटाला न केवल सरकारी संपत्तियों की लूट है, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त गहरी भ्रष्टाचार की जड़ें भी उजागर करता है। संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करते हुए, किसानों को उनकी जमीन से वंचित किया गया और भूमि माफियाओं को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।
मलिक मकबूजा कानून: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
मलिक मकबूजा कानून भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य मालगुजारी प्रथा समाप्त करने के बाद किसानों को भूमि पर स्थायी अधिकार देना था। 1 अक्टूबर 1955 से पूर्व, जो किसान अपनी जमीन पर कृषि कार्य कर रहे थे, उन्हें मलिक मकबूजा हक प्रदान किया गया।इस कानून के तहत किसानों को स्वामित्व का अधिकार तो दिया गया, लेकिन उन्हें यह सिर्फ खेती के लिए उपयोग करने की अनुमति थी। सरकारी अनुमति के बिना इन जमीनों को बेचना या खरीदना गैरकानूनी था। बावजूद इसके, प्रभावशाली साहूकारों और बिल्डरों ने इन जमीनों को किसानों से खरीद लिया और उस पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, होटल और व्यवसायिक प्रतिष्ठान खड़े कर दिए।
गुरु बालकदास और मलिक मकबूजा का संबंध
गुरु बालकदास (1828-1860) छत्तीसगढ़ के सतनामी समाज के महान संत और समाज सुधारक थे। उन्होंने सामाजिक न्याय और किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। गुरु बालकदास ने भेदभाव और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई और गरीब व वंचित समाज को संगठित करने का कार्य किया।मलिक मकबूजा कानून की मूल भावना भी किसानों को सशक्त करने की थी, ताकि वे अपनी जमीन पर आत्मनिर्भर बन सकें। गुरु बालकदास द्वारा शुरू की गई समानता और अधिकारों की लड़ाई ने इस कानून की नींव को मजबूत किया। उनका जीवन दर्शन आज भी समाज को न्याय और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
14 आईएएस अधिकारियों पर कार्रवाई: एक उदाहरण
मलिक मकबूजा भूमि घोटाले में मध्यप्रदेश सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए 14 IAS अधिकारियों और 14 राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों पर कार्रवाई की थी। इन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हुए शासकीय जमीनों को प्रभावशाली लोगों के नाम पर चढ़ा दिया।
इसके बाद, जांच एजेंसियों द्वारा विस्तृत जांच की गई और यह पाया गया कि जमीनों का नामांतरण बिना उचित अनुमति और स्वीकृति के किया गया। न्यायालय में इन अधिकारियों के खिलाफ मुकदमे लंबित हैं, और यदि दोष सिद्ध हुआ तो उन्हें कठोर सजा का सामना करना पड़ सकता है। यह मामला छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक भ्रष्टाचार का एक उदाहरण है, जो यह दर्शाता है कि किस प्रकार न्यायिक व्यवस्था में सुधार और कानूनी प्रक्रियाओं की सख्ती से पालन की आवश्यकता है।
संघ का कहना है कि किसानों के अधिकारों को पुनः स्थापित करने के लिए शासकीय भूमि को अवैध कब्जाधारियों से मुक्त कराया जाना चाहिए और दोषी अधिकारियों को न्यायालय के समक्ष लाकर सजा दिलाई जानी चाहिए। भारतीय संत सनातन धर्म रक्षा संघ ने स्पष्ट किया है कि यह लड़ाई सिर्फ मलिक मकबूजा भूमि को वापस लेने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऐतिहासिक लड़ाई बनेगी, जिसमें दोषियों को सजा दिलाकर न्याय सुनिश्चित किया जाएगा।




